*‘तुझे... देखूँ’*
तुझे नदी और सरोवर में रोशनी-सा उतरता देखूं,
तुझे उपवन के गुलों में खुशबू-सा महकता देखूं ।
मेरे बाहों में तेरा होना ये एहसास मैं रोज़ करता हूं,
कभी जल बिन मछली-सा खुद को तड़पता देखूं ।
जब खुद को मैं कभी अकेलापन महसूस करता हूं,
तब दिल के एक कोने में तुझे मैं सदा धड़कता देखूं ।
रात के अंधेरे में गगन में सारा सन्नाटा छा गया है,
इन सन्नाटों में खुद को सितारों-सा टमटमता देखूं ।
तेरे और मेरे बिच में जमीन-आसमान-सी दुरियां है,
फ़िर भी चित्त सागर में तुझे प्यार-सा छलकता देखूं ।
जिस रास्ते से अक्सर जो मैं पवन-सा गुजरता हूं,
तेरे घर के आगे खड़े होकर मन को मचलता देखूं ।
यह अच्छा ही हुआ कि तुम भीतर मुझे मिल गएं,
तेरे हसिन चेहरे पे भाव संचालनों को टहलता देखूं ।
*-- जितेन्द्रकुमार बि. बिलवाल*