अनकही
कुछ अनकही बातें
अक्सर कानों में कह देती हैं
शब्द तलाशो मेरे लिये तुम
और अनकहे के बेड़ियोँ से मुक्त करो
घुट रही हूँ वैसे ही जैसे
उम्र क़ैद मिलती है जिसको
अँधकार में रहती हूँ मैं
दीवारों से चाहो पूछ लो
नहीं मनसूबा मेरा कोई
तुमसे अलग हो जाने का
शब्द और वाणी दे सको तो
सूर्य की किरण में मैं भी घुल जाऊँ
तूम सब की तरह मैं भी जन्म लूँ
साँसों की अनुभूति हो सकेगी
रंगों को देखूँ, नभ को निहारूँ
सुना है पाँच इन्द्रियों के स्वामी तुम
फिर मैं क्यों रह गयी अनकही
अनकही अनकही।
कल्पना भट्ट
रचनाकाल 17 मई 2021