कोरोना की दूसरी खुराक क्या लगी मैंने अपने अंदर भीम को महसूस करना शुरू कर दिया ।और निकल पड़ा वैक्सीन की गुणवत्ता के परीक्षण हेतु , इसके लिए हमने पूरी रणनीति पहले ही बना ली थी अर्द्धांगिनी को उनके पिता से भेंट कराना भी उसी रणनीति का अहम हिस्सा था । मैं जानता था की ससुर जी मुझे बैरंग ही लौटाएंगे । सच कहूँ लौटते वक्त मन बड़ा हल्का था, ऐसा लगता था जैसे विश्व का सर्वाधिक स्वतंत्र जीव एकलौता मैं ही था । अब मेरे मिशन गुणवत्ता परीक्षण का प्रथम चरण आरंभ हो चुका था । मैं राजधानी जाने वाली बस पर सवार हो चुका था , बस में सवारियां उँगलियों से ज्यादा नहीं थी । इन में कुछ तो वे लोग थे जो बस से तेज भाग रहे थे क्योंकि वे अपने परिजनों को इसी धरा पर रोकने के लिए जल्दी ही उनके पास पहुंचने को आतुर दिखते थे ,उनका मन बस में ही था ऐसा मुझे पूरी यात्रा में कभी नहीं लगा यहाँ तक की परिचालक के कई बार बोलने पर ही उन्होंने टिकट लिया था । कुछ लोग ऐसे भी थे जो इसलिए भाग रहे जैसे उन्हें कोई पीछे से खदेड़ रहा हो और यदि वे उससे आगे नहीं निकले तो अनर्थ हो जाएगा ।उनमें से एक जो 50 के लगभग था ,चालक से बस को वायुयान बनाने का आग्रह कई बार कर चुका था । ऐसा लग रहा था कि भगवती चरण वर्मा के उपन्यास सामर्थ्य और सीमा के सभी पात्र बस से भाग रहे हैं । हताश -निराश और भयभीत ।यह भय है बड़ा विचित्र जीव इसे किसी ने संभवतः विभेद करना सिखाया ही नहीं तभी तो यह सभी को एक जैसी ही अनुभूति देता है ।बस में दो और लोग थे जो बस के साथ इसलिए भाग रहे थे ताकि उनके बच्चों में भागने की शक्ति संचरित करने के साधन जुटाए जा सकें । भय उन्हें भी था बस उसका उद्दीपक अलग प्रकार का था ।पूरी बस में मैं इकलौता आदमी था जिसे अर्धांगिनी के फोन काल से ज्यादा डर किसी बात का नहीं था ,पता नहीं कब कौन सा आदेश पारित हो जाए और उसका उल्लंघन कन्टेंम्ट आफ कोर्ट हो लेकिन था मैं भी बड़ा चालाक मैंने फोन को रिचार्ज ही नहीं कराया था और सोच रखा था कि विजय श्री के बाद ही कराऊँगा ।
मेरे लक्षित स्थल क्रमशः भीड़ भरे स्थल और कोविड समर्पित रुग्ड़ालय ही थे ।मैंने बस स्टाप पर ही उतरने का निश्चय किया ……….क्रमशः