ये बात करते राम राज की...काम करते रावण राज की.... अब क्या कहूं फितरत इनकी को... ये सच को हैं झूठ बनाते...झूठ को हैं सच बनाते ...अब क्या कहूं फितरत इनकी को.... ये वोट मांगते रोजगार पर... युवा को हैं घर भिटाते बेरोजगारी को हैं भड़ाते...अब क्या कहूं फितरत इनकी को... ये पंद्रा लाख के नाम पर बरगलाते लोगों को...इन्हे फिकर पड़ी बस भाभी जी(अंबानी) की...अब क्या कहूं फितरत इनकी को.... सूरज के ताप में खुद को गौ रक्षक हैं बताते... चांद की चांदनी में भक्षक हैं बन जाते.... अब क्या कहूं फितरत इनकी को....