Hindi Quote in Poem by Rajesh Maheshwari

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जीवन की नदी

मानव सोच रहा है
कि जीवन और नदी मे
कितनी है समानता
बह रही सरिता
कि जैसे चल रहा हो जीवन।
तैरती वह नाव जैसे डोलती काया
दे रहा है गति नाव को
वह नाव में बैठा हुआ नाविक
कि जैसे आत्मा इस देह को
करती है संचालित
और पतवारें निरन्तर चल रही है
कर्म की प्रतीक है ये
जो दिशा देती है जीवन को
कि यह जाए किधर को।
जन्म है उद्गम नदी का
और सागर में होता है समापन
शोर करती नदी पर्वत पर उछलती जा रही है
और समतल में लहराती शान्त बहती जा रही है
दुख कि जैसे करूण क्रंदन
और सुख में मधुर स्वर गा रही है
बुद्धि कौशल और अनुभव के सहारे
भंवर में, मझधार मे, ऊँची लहर में
नाव बढती जा रही है।
दुखों से, कठिनाईयों से
जूझकर भी सांस चलती जा रही है।
स्वयं पर विश्वास जिसमें
जो परिश्रमरत रहा है
लक्ष्य पर थी दृष्टि जिसकी
और संघर्षों में जो अविचल रहा है
वह सफल है
और जिसका डिग गया विश्वास
वह निश्चित मरा है।

Hindi Poem by Rajesh Maheshwari : 111704387
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