"आह" जब निकलती दिल से,
चुप है, फिर भी शोर मचाता।
तब खुलता वरको का दर्पण,
जिस पर है वो स्वर्ग रचाता।
जन्नत बन कलम हथेलियों में,
स्याही से भरा वो दर्द जताता।
हर सत्र में घुलता इत्र "आह" का,
चलता है बेढंगों सा,
फिर कई मर्तबा नक्काशा जाता।
बेसुद सी होकर चलती उँगली,
चुपके से हर राज़ खोला जाता।
गागर से गहरा यह सागर,
अंतहीन में जाकर!!
पूर्ण तृप्ति है कर जाता।
MASTERPIECE क्यों लगता अपना,
क्योंकि उसमे दिल है लिखा जाता।
साक्षी