बात सटीक है पर आज की वास्विकता भी यही है
दोषी ये सारा जमाना है ।
अपनी ही गलती की सजा हम भुगत रहे है ये कोरोना का तो बस एक बहाना है।।
*नदी से* - पानी नहीं , रेत चाहिए
*पहाड़ से* - औषधि नहीं , पत्थर चाहिए
*पेड़ से* - छाया नहीं , लकड़ी चाहिए
*खेत से* - अन्न नहीं , नकद फसल चाहिए
उलीच ली रेत, खोद लिए पत्थर,
काट लिए पेड़, तोड़ दी मेड़
रेत से पक्की सड़क ,
पत्थर से मकान बनाकर
लकड़ी के नक्काशीदार दरवाजे सजाकर,ો
अब भटक रहे हैं.....!!
सूखे कुओं में झाँकते,
रीती नदियाँ ताकते,
झाड़ियां खोजते लू के थपेड़ों में,
बिना छाया के ही हो जाती सुबह से शाम....!!!
फिर भी सब बर्तन है खाली l वाह रे इंसान तूने तो अपने हाथों
अपनी ही कबर खोद डाली
अरे सोने के अंडे के लालच में ,
घर की मुर्गी ही मार डाली !!!,
विचार अवश्य कीजिये।।