श्रमिक
मेहनत कश लोग न होते
तो न बन पाते महल-चौबारे
कैसे बनती गगनचुम्बी कोई कहीं
सीमेंट, ईंट रेता में 'गर न सनते
न बनती फिर कोई इमारत
न होती कहीं कोई हम्माली
कौन उठाता सामान किसीका
जब न होते कोई कुली
खेतों में मजदूरी करते
कहीं शहरों में भागते फिरते
दो टूक रोटी की ख़ातिर ही तो
अपने घर से दूर ही रहते
ज़मीन इनकी होती बिछौना
आसमान इनके लिए छत बन जाता
लोग कहते मजदूर हैं जिनको
वे होते अमीर श्रमिक पर
करते है जो यह काम सब मिलकर
क्या कोई एयर कंडीशन में
बैठा अफ़सर कर देगा?
मेहनतकश रहता फटे हाल भले ही
पर होते ज़िंदा दिल बहुत है
दिन भर धूप में तपते रहते जो
शाम को थिरकते गाते-बजाते
अंश मात्र इनसे कोई सीख सके तो
जीवन उनका सफल हो जाये।