मज़दूर
ईंट नीव की चुपके से नत नयन श्रमिक से बोल पड़ी
भवन कंगूरे अट्टालिकाएं जब हो जाएंगी मुझपे खड़ी
ये खुश होकर मुस्काएंगी कोई दर्द न अपना समझेगा
तेरी - मेरी है नियति यही क्या कोई इसको बदलेगा
मज़दूर के खून - पसीने से निर्माण राष्ट्र का होता है
सर्जक होकर कोई मजदूर क्यों खून के आंसू रोता है
दुनिया के सारे दुख और दर्द क्यों इनके अपने होते हैं
इनके हक़ में मुठ्ठी भर सुख क्यों एक सपने से होते हैं
गरम - गरम इनके अश्कों की लड़ी नहीं यदि टूटेगी
देश की सारी चमक - दमक तुहिन कणों सी फूटेगी
मजदूर देश की धड़कन हैं बिना सांस कोई जीता है
इनका श्रम है इतना पावन जैसे रामायण - गीता है
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