सुबह के सर्द मौसम में हवा की एक लहर आई, मै पूछा क्या मेरे महबूब का पैगाम है लायी||
नहीं तो बस बता दे ये कि मैं बेचैन हूँ फिर क्यूँ, यकीं क्यूँ तुझपे है तू उसकी खैरियत लायी||
छुआ होगा उन्ही जुल्फों को जिनमे कैद हूँ अब मैं, उन्ही पलकों को जिनकी शर्म में भी अब तलक हूँ मैं||
दिया होगा इशारा कुछ हसीं नज़रों ने भी तुमको, लरजते होंठ भी तुमसे बयां कुछ तो किये होंगे||
हो गए हम दूर कि अब मिल नही सकते, तड़प सकते हैं मन में आह भी अब भर नही सकते||
इंसानियत के सामने एक आफ़त है यूँ आई| बना दी जिसने हम सभी के दरमियान खाई|
मुफलिसी का दौर एक सारे जहाँ में है, जिधर भी आँख उठती है गम-ओ-ग़ुरबत का डेरा है||
मगर उम्मीद है करवट बदल देगा समय फिर से, एक बार फिर से हर तरफ अम्न-ओ-सुकूं होगा||
जज़बात मेरे सुनकर हवा भी मुस्काई, बोली तेरे महबूब ने भी ली थी अंगडाई|
एहसास उसको भी तेरा शायद हुआ होगा, जब उसके गालों को प्रिये मैंने छुआ होगा|
कह नही सकती हूँ ज्यादा, बस इतना समझ ले तू|
वो तुझसे प्यार करती है तू उससे प्यार करता है||
संकट के इस काल में सभी दोस्तों को समर्पित|
स्वस्थ रहें सुरक्षित रहें|
अर्जित मिश्रा