जब तक
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जब तक न समझेंगे हम सब स्नेह बाँध रखें पोटल में
जब तक मन की गाँठ खुले न कोई न होंगी आशाएं
नेह नीड़.पुष्पित न होंगे बूँद बूँद राही तरसेगा
जब तक हर मन स्नेह न होगा मन के भीतर न करुणा ह़ो
व्यथित हो उठें मर्यादाएंऔर चनारों की सरगर्मी
फुसफुस कर कह पाएं न कुछ कोई मौसम नेह न होगा
उन आँखों में भरे रहे गर ढुलमुल करते झरते बादल
एक भूख से व्याकुल होकर पीड़ाएं सारी पी जाएं
तब तक क्षुधा न बुझ पाएगी जब तक हर मन भोर न होगा।
डॉ. प्रणव भारती