मेरे रेत के घरौंदें को बार बार क्यों गिराता है तू।
यूँ मेरे हौसले को बार बार क्यों आज़माता है तू।
तुम्हें पता है कि मुझे अंगारों पर चलने का शौक है।
फिर मेरे लिए ये अग्नि क्यों जलाता है तू।
कई बार भेदा है हमने तेरे बनाये चक्रव्यूह को।
फिर मेरी राहों में ये शूल क्यों बिछाता है तू।
मुझे आदत नहीं है किसी की आह ! सुनने की।
फिर हृदय विदारक ये चीख क्यों सुनाता है तू।
-Arjun Allahabadi