पता है तुम्हें
देखा तो तुमने बस एक निगाह भर मुझे
पर लगा जैसे सालों से पहचानती थी तुम्हे
अजनबी तो थे तुम पर जानने सी लगी थी तुम्हे
थोड़ा सा ही सही पर महसूस तुम मुझे होने लगे
बार बार मेरे ख़यालो में तुम आने लगे
यकीन था मुझे की तुम कहीं नहीं हो
जाने क्यों फिर मेरे आस पास रहते हो
नज़र भर भी मैंने देखा नहीं तुम्हे
चाहत देखने की नज़र भर ही तो थी
मेरे हर लफ्ज़ में आजकल तुम आते हो
रोकूं भी कैसे तुम्हे तुम दिल हो कहां सुनते हो