रोज़ की तरह तुम नहीं आए
तस्सली पर तसल्ली दिए जा रही थी दिल को
तेज़ होती धड़कनों को बहला रही थी
हाथो में जो घड़ी बांधा था उतार कर रख दी
बच्चो के साथ बच्चो सी बातें करने लगी
अब सब्र टूट रहा था बस आंखे बरसने ही वाली थी कि
तुम आ गए ,,,,,,अब कैसे रुकती ये बरसात
रोज़ की तरह जो तुम नहीं आए थे