मैं लेखक कैसे बना?
मुझे अखबार पढ़ने का शौक जब मैं8वी मे पढता था।तब लग गया था।मेरी पढ़ाई किसी एक जगह नही हुई।तीसरी तज की पढ़ाई गुजरात मे हुई।राजकोट और जामनगर।चौथी क्लास में बांदीकुई आ गया।पांचवी अछनेरा से फिर 6व7वी बांदीकुई से8व9वी अजमेर से 10वी ब्यावर से11वी आबूरोड से और कॉलेज की पढ़ाई जोधपुर और आगरा से
10वी के बाद मैगज़ीन पढ़ने का शौक लगा।सरिता,धर्मयुग,हिंदुस्तान,अरुण,साथी आदि मैगज़ीन पढ़ने लगा।11वी के बाद उपन्यास पढ़ने लगा।उन दिनों बाजार में लाइब्रेरी होती थी।जंहा किराये पर किताबे पढ़ने को मिलती थी।
मैने गुरुदत्त,आचार्य चतुरसेन,प्रेमचंद,कृष्णचन्द्र,जासूसी पॉकेट बुक्स विदेशी लेखकों के अनुवाद जिनमे टॉलस्टॉय प्रमुख है।मैं उन दिनों एक दिन में दो दो उपन्यास भी पढ़ लेता था।पढ़कर ही लिखने का विचार आया और कॉलेज के दिनों में लिखने का प्रयास किया।लेकिन कभी भी कुछ लाइनों से ज्यादा नही लिख पाया।
घटनाक्रम अचानक बदला।पिता की मौत से परिवार की जिम्मेदारी आ गई।पढ़ने का शौक नही छूटा।फिर शादी हो गई।लेकिन writer बनने की ललक बनी रही।
सन 1978 में मैंने कहानी लेखन विद्यालय अम्बाला में प्रवेश ले लिया।गुरु बने डॉ महाराज कृष्ण जैन
और कोर्स पूरा करने के बाद 1978 में दिल्ली से प्रकाशित होने वाली,दीवाना तेज, में पहली रचना राशिफल छपी
और लेखन का सफर शुरू हुआ