गर मुनासिब समझो तो लौट आओ।
कुछ पल और साथ रह के मेरे।
गिरेबाँ में झांक कर देखो
क्या तुम्हारे लिए बे इन्तेहाँ
मुहब्बत है या नहीं....
चंद कदमों से समेट लो
ये वर्षों की दूरियाँ
जो सिमट न पायीं
एक अरसे से .......
तुम्हारी बाहों के घेरे में
खुद को महफूज समझते हैं
बड़ी तसल्ली से
दिन का सूरज डूबता था....
अब मयकशी में वो दम नहीं
जो नशा मेरे महबूब की आंखों में है
भरे प्याले भी अब बेकार लगते हैं
जब से निगाहों में हमने खुद को देखा है...