हमें वह क्षण नहीं भूला बसन्ती जब हुआ था मन ।
मिले थे तुमसे हम पुष्पित हुआ था अपना तन और मन ।
हँसा आकाश संग उसके हँसी चारों दिशाएँ ।
प्रतीति हो रही थी हँस रही पछुवा हवाएँ ।
धरा का स्नेह मुझको स्मरण है आज तक ।
भला अनुराग के उस क्षण को हम कैसे भुलाएँ।।
हुआ था मदिर जीवन का छोटा बड़ा हर क्षण ।।
नये कोमल मुलायम पत्तों का जीवन से मिलना।
जगतान्नदवर्धन हेतु नयी कलियों का खिलना ।
उस हरेक क्षण की स्मृति ताजी है अभी तक ।
तुम्हें कानों से सुनना और तुम्हें आँखों से सुनना।
तुम्हीं थे मेरे जीवन निधि के सबसे बड़े धन ।।