*लघुकथा - दो बेटों की माँ
"अम्मा एक बताओ? आप रहती,...खाती,...सोती तो हमारे साथ हो, पर बजाती छोटे बेटे-बहू की हो."
"ये क्या कह रही हो बडी बहू ?"
"और नहीं तो क्या?...उनके जरा से झूठे बुलावे पर भी, खाने की थाली तक छोड एक टाॅंग से, उनके पास दौड़ी चली जाती हो, जैसा आज अभी आपने किया।" पूनम ने गुस्से से कहा।
"क्या करूँ बेटा ... माँ हूँ न, माँ के लिए तो सभी बच्चे समान होते हैं, उसके दिल के टुकडे़ होते हैं, और वो तो सभी से बराबर प्यार करती है।"
"पर आप तो छोटी बहू की जी हजूरी में लगी रहती हैं। और आपकी इसी कमजोरी का खूब फायदा उठाती है. काम पडे़ तो पूछने लगी ..."
"बड़ी बहू, ....छोटी की सोच छोटी है, इसलिए जरा जरा- सी बातों की लड़ाईयों ने इतना बडा़ रुप ले लिया कि, घर के साथ दिलों के बीच में भी लकीर खींच गई, यही बात मुझे दिल में फाॅंस की तरह दिन रात चुभती रहती है."
"अरे अम्मा,...जो होना था, सो हो गया, अब आप क्यों नाहक चिंता में पडीं हैं."- पूनम ने समझाते हुए कहा।
"मैं इस कोशिश में लगी रहती हूँ, कि यह लकीर और मोटी न होने पाये, और कहीं मुझे भी बाॅंटने की नौबत न आ जाये।"
"ऐसा नहीं होगा अम्मा।"
"हाँ,... बड़ी बहू ,...मुझे यकीन है कि, तू मेरी तकलीफ को जरूर समझेगी और मेरी आस को टूटने नहीं देगी, आखिर तू भी तो दो बेटों की माँ है।"- अम्मा ने बडी़ बहू की आॅंखों में झाॅंकते हुए,बडी़ उम्मीद से कहा।
अर्चना राय
भेड़ाघाट, जबलपुर (मध्य प्रदेश)