" पापा तुम्हारी याद आ रही है "
पापा तुम्हारी बहुत बहुत याद आ रही है,
मैं हो चुका हूं बड़ा पर तुम्हारे लिए तों था बच्चा।
इतना भी बड़ा हुआ नहीं पापा मैं अभी भी,
तुम्हारा साया छोड़ खुद अकेला चल सकूं।
थाम कर उंगली आपकी चलना मैंने सीखा था,
बार-बार गिरता आपने संभलना सिखाया था।
दुनियादारी के रंग ढंग और जीने का सलीका सिखाया था,
गिरगिट की तरह रंग बदलती दुनिया संभलना सिखाया था
हर मुसीबत उलझन जीवन की, सुलझाना सिखाया था,
अपने और परायो के भेज भरम सही रास्ता दिखाया था।
पर पापा क्यों बीच मझधार में यूं अकेला मुझे.....
छोड़कर कौन सी मंजिल की ओर आप चले गए।
सब कुछ हो कर सकता हूं मैं, जो आप ने सिखाया था,
पर बिना आपके सहारे, मैं अकेला चल भी ना पाऊंगा।
हर दिन हर रात "मित्र" सोचता विधाता की कैसी लीला है,
बच्चों को उनके मां-बाप से क्यों असमय यूं जुदा करता है
(पापा की पांचवी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि के रूप में एक काव्यांजलि अर्पित कर रहा हूं। पापा का स्वर्गवास दिनांक 04, 02, 1997 हुआ था)
मनिष कुमार "मित्र" 04, 02, 2021 🙏