पता नहीं कौन से वक्त की तलाश में,
चल रही हुं, दौड़ रही हुं, उड़ रही हुं...
खुद को तलाश करने की नाकाम कोशिश....
रोज़ाना की रूटीन,
दूध, सब्जी, रसोई...
बर्तन, घर की सफाई...
कपड़े, बच्चों की पढ़ाई...
जिम, गार्डनिंग और कढ़ाई....
ये सब छोटे छोटे काम से
खुद को मजबूत पाती हुं...
कभी लगता है बस...
बहोत हो गया....अब तो
हमेशा के लिए सोना है...
फिर भी......
रोज़ सुबह....
वोही रफ्तार....
और अहसास होता है कि...
अभी भी सांस बाकी है...
अभी भी बहुत सफ़र बाकी है...
चाहे हिन्दी वाला या इंग्लिश वाला सफ़र...
कोई फर्क नहीं पड़ता...
जब तक सांस है , चलना है, दौड़ना है, उड़ना है....
- हर्षिदा डाभी