"अति सर्वत्र वर्जयेत...."
जो आज दिल्ली में हुआ... वो पूरी तरह संभावित था...चीजें कई बार सही/गलत नहीं होती.. बस होती हैं.. आदर्श और व्यावहारिकता/वास्तविकता में अंतर होता है।आदर्श था कि सारे किसान संयम रखते, वास्तविकता/व्यावहारिकता ये भी थी कि कुछ किसान उग्र भी हो सकते थे या गुमराह भी... और सब के पास अपने कारण है..
जिनकी नज़र में ये किसान कानून गलत है,उन किसानों में से कई किसान पिछले कई महीनों से घरबार छोड़कर सड़कों पर सर्दी,बरसात झेल रहे हैं...157 किसानों की जान जा चुकी है, सरकारी बातचीत का नतीजा बस अगली तारीख रहा है...किसानों की माँग भी कोई बहुत बड़ी और असंभव माँग नहीं है लेकिन सरकार ने इसे अपनी नाक का सवाल बना लिया है,जिसका झुकना जैसे नामुमकिन है फिर भले ही इस आंदोलन से रोज हजारों करोड़ रुपयों का नुकसान हो,कितने किसानों की जान जाती रहे..इसके बावजूद भी कई किसानों ने शांतिपूर्वक प्रदर्शन का रास्ता चुना,तो कई किसानों का अब धैर्य टूट गया है,शांति में विश्वास नहीं रहा,क्योंकि उसका कोई परिणाम भी नहीं निकल रहा...
जो भी हुआ,वो आज या कल होना ही था...हो सकता है आगे भी कुछ और उग्र प्रदर्शन देखने को मिले,भीड़ जब सीमित होती है तो उसे नियंत्रित करना आसान होता है,लेकिन इतनी ज़्यादा संख्या में भीड़ को नियंत्रित करना और समझा पाना संभव नहीं हो पाता ना नेतृत्व के लिए ना ही पुलिस के लिए..... . शायद अपनी ताकत/संख्या बल दिखाने के लिए ही आज ये प्रदर्शन किया गया था...बेहतर है सरकार अपने अहम् को त्यागे और समझे कि समस्या सिर्फ कुछ किसानों की नहीं है, बल्कि बहुत सारे किसान इससे प्रभावित हो रहे होंगे,खुद कई सालों से सरकार की सहयोगी पार्टी की मंत्री ने इस बिल के खिलाफ इस्तीफा दे दिया था.
अगर सरकार कानूनों पर डेढ़ साल के लिए रोक लगा सकती है तो उन्हें वापस क्यों नहीं ले सकती.. सभी संगठनों के प्रतिनिधियों से बात कर दुबारा कानून बना सकती है..
प्रांजल,
26/01/21,11P