मैंने समय को देख लिया था
वह तीखे पंजे मार रहा था,
बिल्ली की तरह
देख रहा था,
शेर की तरह
दहाड़ रहा था।
नदी बनकर चलता था
समुद्र की भाँति उछलता था,
जीवन बन कर आता था
मौत बन कर जाता था।
मैंने समय को देख लिया था
वह पंजे बहुत मार रहा था,
प्यार जटिल बना रहा था
गहन क्रियाओं में डोल रहा था।
धरती जैसा लगता था
आकाश जैसा फैल रहा था,
मेरे अन्दर आ रहा था
मुझसे बाहर जा रहा था।
मैंने समय को देख लिया था
वह अद्भुत पंजे मार रहा था।
**महेश रौतेला