सदियां गुजर गईं
न उम्मीद कम हुई
न इंतज़ार खत्म हुआ......
खुद ही आँसू पोछते हैं
खुद ही मुस्कुरा देते हैं
न वजह कम हुई
न सवाल खत्म हुए.....
खुशी के हासिये पर
खुद को तनहा छोड़ रखा है
जनता हूँ कि जाने वाले वापस नही आते
पर न इश्क कम हुआ
न प्यार कम हुआ.........
वो मुझे बिलखता छोड़ गया
तपती हुई रेत की सिलवटों के बीच
न नफरत कर सका उस से
न दुलार कम हुआ.......
बस सिसकते होठों के
बीच से मुस्कुराहट की
आहटें आती रहीं
न इख्तियार कम हुआ
न ऐतबार कम हुआ...........