प्यार : प्रभु से सच्चा प्यार
हो जाए जिसे, प्रभु से सच्चा प्यार,
भौतिक प्यार लगता है उसे बेकार।
प्यार के अनेक रूप हैं इस जग में,
प्यार का, हर रिश्ता होता हकदार।
इंसान को हर प्यार निभाना पड़ता,
जो निभाता, कहलाता है समझदार।
जो जाए जिसे…………
सफर एक नदी, जिंदगी जैसे नैया,
प्यार मांझी, प्यार ही होता पतवार।
प्यार में शक्ति और भक्ति दोनों हैं,
प्यार पर टिका है, यह सुंदर संसार।
प्यार प्रभु का पहुंचता है जहां जहां,
वहीं पर, आते लहराते वसंत बहार।
हो जाए जिसे……………
सच्चा प्यार न झुकता, न टूटता कहीं,
सच्चे प्यार से, यह जग मानता हार।
जहां प्यार होता है, नफ़रत नहीं होती,
प्यार खोल देता, कोई भी बंद द्वार।
प्यार ऊंच नीच की खाई पाट देता है,
सच्चा प्यार, है जहां प्रभु का दरबार।
हो जाए जिसे…………..
प्रमाणित किया जाता है कि यह रचना स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसका सर्वाधिकार कवि/कलमकार के पास सुरक्षित है।
सूबेदार कृष्णदेव प्रसाद सिंह,
जयनगर (मधुबनी) बिहार