खुली आँखों में सपना जागता है
वो सोया है के कुछ कुछ जागता है
लोग न जाने किन रातों की मुरादें माँगा करते हैं
अपनी रात तो वो जो तेरे साथ गुज़र गई जानां
खुद अपने से मिलने का भी यारा न था मुझमें,
मैं भीड़ में गुम हो गई तनहाई के डर से।
हुस्न के समझने को उम्र चाहिए जानाँ
दो घड़ी की चाहत में लड़कियाँ नहीं खुलतीं
कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी
दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी
मैं सच कहूँगी मगर फिर भी हार जाऊँगी
वो झूट बोलेगा और ला-जवाब कर देगा
~ Parveen shakir
(પરવીન સાકીર પાકિસ્તાનની કવયિત્રી છે.)
In loving memory...
#Gazals #26.12.94
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