हम से तुम तुम से हम
ना जाने कैसे मिले,
ना जाने कैसे जुड़ते चले
हम दोनों के सिलसिले,
ना पहचान हमारी थी
ना सूरत से यारी थी,
फिर भी तुमसे हम और हमसे तुम
ना जाने कैसे जुड़े,
समझ नहीं आता कैसे
जुड़ जाती है राहे अनजानी राहों से,
एक दूसरे से अलग होकर भी
हम एक दूसरे से जैसे मिले,
दूर दूर होकर भी ना जाने
कहां से कहां जुड़ जाती है राहे,
मंजिल का पता एक दूसरे से
खुद ब खुद पूछ लेती है,
एक हो जाते हैं दो ऐसे अजनबी
जिनकी ना कभी आस होती है,
जुड़ जाते हैं ऐसी डोर से
जो कभी ना अलग होती है,
बन जाते हैं दो पराए भी अपने
नए रिश्ते की शुरुआत नयी होती है,
बंध जाता है एक ऐसा अटूट बंधन
प्यार की शुरुआत नयी होती है ।
Written by- Sakshi Jain