मंदिर से बाहर निकली तो कुछ काम याद आ गया. मंदिर तक तो पैदल ही आई थी लेकिन आगे तक पैदल जाना थोडा कठिन था. मंदिर के सामने एक साईकिल रिक्शा खड़ा था. एक बाबा उस पर बैठे सुन्दर काण्ड पढ़ रहे थे. समझ में नहीं आ रहा था, रिक्शा चलाते होंगे या रिक्शे वाले के अनुपस्थित होने के कारण बैठे थे. और कोई साधन दिख नहीं रहा था, तो हिम्मत करके पूछा, बाबा कुछ दूर तक पहुंचा देंगे क्या? “हाँ -हाँ क्यों नहीं, बैठिये बेटा जी. वो तो सवारी नहीं थी तो हम प्रभु के नाम में लग गए”.
पैसा कितना लेंगे? जितना मन में आये दे दीजियेगा, हमें कुछ करना थोड़े है, बस राम का नाम लेना है और दो जूनकी रोटी खानी है. मैं बैठ गयी. पास ही जाना था काम भी कुछ दस –पंद्रह मिनट का ही था. बाबा मेरी प्रतीक्षा को सहर्ष तैयार हो गए. वापसी में मुझे घर तक छोड़ा, सुख दुःख की बातें की.
बाबा श्री हरी से प्रार्थना में दो ही बातें कहते हैं. एक तो जीवन में कभी किसी के आश्रित न होना पड़े और दूसरे उनका मन श्री राम के चरणों में रमा रहे. वैसे तो श्री हरी और श्री राम एक ही हैं लेकिन बेटा जी हम तो केवट हैं और केवट का जीवन तो श्री राम को ही समर्पित होना चाहिए. वो बोलते जा रहे थे.........
श्री राम जी की जन्मभूमि पर उनका मंदिर भी देख लेते तो केवट जन्म सफल हो जाता.
इस वाक्य पर सहसा ही मुंह से निकल गया, “जन्म एकदम सफल होगा बाबा, मन्दिर तो बन कर ही रहेगा.”
अब तक घर भी आ आया था.
मैं रिक्शे से उतरी, पैसे दिए. मुड़ती कि वो फिर बोले, “बेटा जी, आपको हजारों हज़ार आशीर्वाद.” उनकी आँखों में देखा वो सिर्फ आशीर्वाद बोल नहीं रहे थे, दे रहे थे. शायद नमी भी थी आँखों में.
जाने क्यूँ लगा ये जो ऐसे अजनबी और सच्चे आशीर्वाद मिलते हैं कभी कभी, यही ईश्वर का भेजा हुआ सुरक्षा कवच बनते हैं हमारे लिए.