न आग लगी न धुँआ उठा ,
बस धू धू कर जल गया मकान।
मैं सिमटा रहा खामोशिया ओढ़े।
दे गया वो मुझको अमिट निशान।
ज़ख्म दर ज़ख्म सहता रहा सितम
फिर भी क्यों बन्द रही जुबान।
बे इन्तेहाँ दर्द सह कर भी।
पल भर में भूल गया इंसान।
वो करते रहे खिलवाड़ दिन्दगी से।
जान कर न समझा नादान।