रात आँखों में ढली पलकों पे जुगनूँ आए...
रात आँखों में ढली पलकों पे जुगनूँ आए,
हम हवाओं की तरह जाके उसे छू आए...
बस गई है मेरे अहसास में ये कैसी महक,
कोई ख़ुशबू मैं लगाऊँ तेरी ख़ुशबू आए...
उसने छू कर मुझे पत्थर से फिर इंसान किया,
मुद्दतों बाद मेरी आँखों में आँसू आए...
मैंने दिन रात ख़ुदा से ये दुआ माँगी थी,
कोई आहट ना हो दर पर मेरे जब तू आए...
*बशीर बद्र... जगजीत जी...*