कहानी मुख़्तसर थी!!
हम थे इश्क़ में
कौन जाने वो थे किसमें।
इश्क़ में वादों की होती है गुज़ारिश
उनको रहती थी हमेशा मेरी तस्वीर की सिफारिश।
मुझसे है मोहब्बत या मेरी तस्वीर से
कौन जाने वो है किस दौर- ए- ज़हीद से।
सबकुछ सपना सा ही था
भ्रम टूटा तो सब बिखरा हुआ ही था।
हम बिक गए उनके इश्क़ में
और वो मसरूफ रहे इश्क़ के खेल में।
बस कहानी तो मुख़्तसर सी ही थी।।
मुख़्तसर - संक्षिप्त, छोटा
© स्वाति अमर