आज फिर याद आ गया मेरे दिल में पनाह देने,
फिर यादों का बोझ लगा कर चलबसा अंधेरों में।
साथ था तब मेने उसकी परछाई भी साथ नहीं पाई,
आज आईनों में उसका मुस्कुराता चहेरा मुज में पनाह दे गया।
पढ़ाई के सिलसिले जैसा मुक्कब्बल हो गया मेरा इश्क़,
जाने के बाद क्या आईं उसके हर लफ्ज़ को मेने महसूस कर किताब में उतार दिया।
तू मेरा था है नहीं फिर खुदा ये हाल मेरा कब्रस्तान क्यू ढूंढता रहता,
वो मंजिल भी सात जन्मों की मैंने उसको बिछड़ते हुए खुद का ना हुआ ये पैगाम लिख दिया।
क्या हुआ ए जान मेरे जिस्म में भी उसका लिबाज़ पहना देता,
उसके कहने से पहले मेरी जान बने एक दायरा मैंने इश्क़ से जोड़ कर सब कुछ लुटा दीया।
💞 नाईशा💞