मैं घर से निकला था
तुम्हारे बारे में सोच रहा था,
थोड़ी आँख लगी तो
तुम्हारा ही सपना आया था।
कितनी राहें उतरनी थीं
कितनी राहें चढ़नी थीं,
थोड़ी आँख लगी तो
तुमको ही मैंने देखा था।
पत्रों में संवाद हुआ था
कुछ लिखा,कुछ छोड़ दिया
मन से मन का मिलन रहा था,
थोड़ी आँख लगी तो
तुम्हारे प्रकाश का ज्ञान हुआ था।
आने-जाने के पथ बहुत थे
पथ में पथिक अनेक मिले थे,
थोड़ी आँख लगी तो
मेरे ध्यान में तुम गुनगुना रहे थे।
**महेश रौतेला