ग़ज़ल :- " भूल जा मुझको "
इस कदर मिलने को आऊंगा मैं ,
ये यार भूल न जाना मुझको तुम।
ऐसे तो मंजिल भी थी मेरे सामने ,
मगर दिखाई दिए नहीं तुम रास्ते में।
कौन बेबस है, मानवी या खुदा इस जहां का,
ये सवाल,बेजान पत्थरों से पूछती श्रद्धा मेरी।
रख्खो जो , एक भी आंसू आंखों में तुम ,
होती है इस कदर पीड़ा तड़प जाता हूं मैं।
किसी और के बारे में बात करना पसंद नहीं,
हो तेरा जिक्र जिस बात में, वो पसंद है मुझे।
बांसुरी में श्री कृष्ण की सांसे बस्ती है
और बांसुरी के स्वर लगती राधा मुझे।
ऐसे तो मौन से हैं रिश्ता पुराना मेरा,
ऐसे भी अच्छी लगती हैं तन्हाई मुझे।
" मित्र " की सांसों की खुशबू कब उड़ जाएगी ,
और फिर आप जाकर कहां-कहां खोजेंगे मुझे।
{ ✍️मनिष कुमार "मित्र"04,12,2020 🙏🙏}