आशियाने के सामने खड़े नज़रों में गुल रहा,
साँसों को थाम कर युह वक्त से जूझ रहा।
रात हो रही इश्क़ ए समा में वो थक नहीं रहा,
ये कैसा दस्तूर आवारगी का, जो दिल से उतर नहीं रहा।
महबूब मेरा आज हजार गिले शिक़वे की बाते लेकर बैठा,
फिर ना जाने सामने आने पर अल्फ़ाज़ में उफ्फ नहीं आ रहा।
ये मेरी जिंदगी में भी क्या कोहराम मचा,
दरबदर उसके देखने से जाने क्यों उबल तो रहा।
फिर भी कहीं न कहीं सर्द ठंडी हवा बना उसे देखने के लिए,
हर बार इश्क़ का बेखूब पहरा उस पर भी जो लगा रहा।
DEAR ZINDAGI 💞