जब कहोगे प्यार को बुला लूँगा
तुम्हें भी अपनी बातें बता दूँगा,
जब कहोगे घर पर मिल लूँगा
अपने मन को मरने नहीं दूँगा।
अपने पहाड़ को और ऊँचा कर दूँगा
अपनी नदी को और लम्बी कर लूँगा,
गाँव को और सहज बना दूँगा
अपनी बातों में कुछ मिठास डाल लूँगा।
दादी-नानी की बातों में सच ढूंढ लूँगा
लौट कर इस ओर अवश्य आऊँगा,
टूटे रिश्ते को जीवित कर लूँगा
पर अपने मन को मरने नहीं दूँगा।
* महेश रौतेला