खोगये हो इन महफ़िलों में कहीं,
क्या फर्क पड़ता है जो अकेली हूं में ।
सुननी नहीं जो बात किसी को,
क्या फर्क पड़ता है जो खामोश हूं में ।
डूबे हुए हो खुशियों के समुंदर में,
क्या फर्क पड़ता है जो उदास हूं में ।
लगता है जो तुम्हे बस खरा पानी,
क्या फर्क पड़ता है जो रो रही हूं में ।
जी रहे होक मगन दुनियां में,
क्या फर्क पड़ता है जो घुट घुट के मर रही हूं में ।
~ रुचिता गाबाणी