*स्पर्द्धा , प्रतियोगिता और होड शब्द एक दूसरे के पर्यावाची हैं । इनके आंतरिक भाव लगभग एक जैसे हैं* । जब हम कोई भी कार्य करते हैं तो हमारे मन में यह विचार आया करते हैं कि मैं जो भी कार्य करुं वह इतना अच्छा करुं कि मेरी कोई बराबरी न कर सके । मैं किसी प्रतियोगिता में शामिल होता हूं तो प्रथम स्थान हासिल करुं । ठीक इसके विपरीत जो हमसे स्पर्द्धा कर रहा होता है वह भी ऐसा ही सोचता है कि मैं पूरी ताकत लगाकर इस प्रतियोगिता को जीत लूंगा । *हमारे मन में जब स्पर्द्धा करने का भाव जग जाता है तो हम एक अजीबो गरीब उत्साह से भर जाते हैं । स्पर्द्धा का भाव सदैव नेक कार्यों के लिए किया जाना चाहिए । जब भी कोई देश सेवा , समाज सेवा और जनहित के लिए कोई कार्य कर रहा हो उससे आगे निकल जाने की अभिलाषा रखनी चाहिए , अपने साथ सहयोग करने वालों से कभी भी इर्ष्या का भाव नहीं रखना चाहिए* ।
" सुप्रभात जी "
।। जय सियाराम जी।।