माह में दस दिन इंसान का
व्यावसायिक दौरे पर बाहर रहना,
शेष दिनों में ज्यादातर देर रात्रि
पार्टियों से घर लौटना,
बच्चों का हर बजती दरवाजे की
घण्टी पर दौड़ कर देखना,
फिर निराश हो सो जाना।
पत्नी का इंतजार पहले चिंता
फिर झुंझलाहट, अन्ततः अवसाद
में तब्दील हो जाना।
इंसान का इस तरह से बदलना
छद्म आधुनिकता का चोला पहनना,
न खुद ही समझना न दूसरों का समझाना
खुद ही अपने घर को उजाड़ना।
परिणाम पारिवारिक क्लेश।
पत्नी का एक यक्ष प्रश्न
"यदि यही दिनचर्या मेरी हो तो।"