यात्रायें कहाँ समाप्त होती हैं
यात्रायें कहाँ समाप्त होती हैं
ये बेटे-बेटियों की तरह चलती रहती हैं
ये नाती-नातिनों की तरह दौड़ती रहती हैं,
बहुत बार लोगों की भाँति दिखने लगती हैं
स्वयं से उत्पन्न हो,
स्वयं में समा जाती हैं।
यात्रायें तीर्थ तक जाती हैं
लौट आती हैं घर की ओर
जैसे मैके को आती हैं दुल्हनें,
मनुष्य को मनुष्य बना जाती हैं
प्यार के साथ घुलमिल जाती हैं
जैसे धरती से मिला रहता है जीवन।
यात्रायें जो पंख खोलती हैं
बड़ी-बड़ी उड़ान देती हैं,
स्वतंत्र करती हैं रूढ़ियों से,
घर से बाहर निकलते ही
दोस्ती में परिवर्तित हो जाती हैं।
यात्रायें भूखी-प्यासी बन
तृप्त कर देती हैं,
ये स्वयं में सम्पूर्ण हो
हमें देवत्व देती हैं।
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*महेश रौतेला