शानदार कविता पढ़े ..
# विषय .दशहरा ,विजय पर्व ..
# छंदमुक्त कविता ***
यारों इस बार हमको ,रावण जलाने नही मिला ।
हम सदीयो से ,रावण को जलाते हुए आये ।।
पर हम भीतर के ,रावण को आज तक नहीं ,
जला पाये ।
हैवानियत के रावण ने ,कितनी अबलाओं की ,
इज्जत लुटी ।।
नफरत धृणा के रावण ने ,कितने दंगे फंसाद करवाये।
लोग लोभ लालच के रावण से ,पापाचार करते ।।
अहंकार के रावण ने ,कितनो को धूलधूसरित किया ।
पाखंड के रावण ने ,कितने व्यभिचार किये ।।
आओ हम सब मिल कर ,भीतर के रावण को जलाये ।
भीतर की बुराई जला कर ,विजयादशमी मनाये ।।
दिखावटी पुतले को जला कर ,कुछ पल की खुशी पाये ।
पर भीतर के रावण को जला कर ,जीवन भर का ,
आनंद पाये ।।
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