कभी किसी बच्चे को देखा है खिलौने की दुकान पर.. वो कितनी मासूमियत से अपने प्रिय खिलौने को प्रेम पूर्वक देखता है। चाहता है कि वह खिलौना उसका हो जाए। इसके लिए वो सबकुछ करता है.. हठ करने से लेकर रोने तक। अंततः जब कोई तरीका काम नहीं आता तो पैर पटकने लगता है और इतनी कोशिशों के बाद उस खिलौने को पा लेता है। उसे अपनी ख़्वाहिश के लिए बेझिझक लड़ना आता है।
मगर तुम.. तुम्हें ना हठ करके पाया जा सकता है और ना पैर पटक कर। ना प्रार्थना करके और ना ही रोकर।
हाँ, मगर मैं तुम्हें हमेशा ठीक वैसे ही देखूँगी जैसे बच्चे खिलौने को देखते हैं..
पा लेने की चाहत से,
प्रेम से।
❤️
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