वटबृक्ष की छाया बनकर के , अस्तित्व मेरा साकार किया
कच्ची मिट्टी सा जीवन को , सृजनहार बन के आकार दिया
अगणित बलिदान भी देकर जो , हर खुशी को हम पर वार दिया
मेरी जीत सुनिश्चित करके जो , अपने को जहां से हार लिया
कैसे मै चुकाऊं ऋण उनका , मेरी सांसे बन जो रहते हैं
कोई और तो हो सकता ही नहीं , केवल वो पिता हो सकते हैं
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