ख्वाब ,खयाल, बरकत कर सब रंग भरे स्त्री के दिल में,
नहीं चाहती कुछ बस एक श्रृंगार और मंगलसूत्र अपने जिस्म पे।
जज्बात कहीं रखे आशियाने के हर पल हर दहलीज में,
इकरार , इनकार नहीं किया किसी से जिंदगी के लम्हों में।
बस जीती रही आयनें जैसी तस्वीर को लेके अपनी निगाहों में,
मोह माया ना रखी ना जमीर को गुम होने दिया हर वक़्त में।
बस चलती रहे अपनेपन की चाहत का रिश्ता देख के पति में,
सुहागन बनी रहे हर हालत में हर ख्वाइश जुड़ी अपने समाज में।
जुजती रहे अपने हालातों से, बया ना कर अल्फ़ाज़ को दफना के,
बेबस रह हर आंगन के फूल को खिलाती रहती है अपने प्रेम में।
जैसे कलम और स्याही से भरे कोरे पन्ने में श्रृंगार को,
एक नया वजूद दिया उस स्त्री को अपने नए बने रिश्तों में।
ए खुदा दी चूड़ियां और लाल रंग मांग भर हर जहां को,
हो गया पति जब दुनिया से दूर तो छीन लिया वजूद उसकी पत्नी से।
लिहाज रखे बिना कर दिया उसकी हसीन जिंदगी का बटवारा बेरंगो से,
जैसे कर दिया जहन को पति के साथ अस्थियों में जलाने के।
जिंदा रह कर भी ना रह सकी हर एक एक के नजरो में,
टूट गई और मर चुकी एक विधवा जी कर बंध कमरे में।
जो हर हाल में थी ख़ुश कभी लश्मी और सारेजहाँ के प्यार से,
आज वो फूल सी कली मुरज़ा गई है इस बेरहम रस्मों रिवाज़ो में।
DEAR ZINDAGI 💞