संघर्ष संघर्ष तो प्रकृति कर रही है
हमें बचाने के लिए
हमें जीवित रखने के लिए।
और हम क्षत विक्षत
करते जा रहे हैं उसके
सुंदर तन को
उसके कोमल मन को।
तोड़ दिए हैं परिंदों के घरोंदे
दरख्तों को काट कर।
पानी के स्रोत बन्द कर दिए
जमीं को कंक्रीट से पाट कर।
नदियां गायब हो रहीं नक्शे से
पहाड़ जमींदोज हो गए।
एटम बमों की होड़ से
दुखी समन्दर भी हो गए।
फिर भी कुदरत
हमारी हिफाजत का ध्यान
ध्यान रखती है।
हमारे खाने पीने जीने
का हर सामान करती है।
अपनी कायराना हरकतों को
तुम संघर्ष कहते हो।
अब जागो
क्यों सोते रहते हो।
कहीं देर न हो जाये
हम अपने द्वारा फैलाये गए
प्रदूषण में जल कर
ढेर न हो जाएँ।
संघर्ष करो प्रकृति को नहीं
खुद को बचाने का।
प्रकृति तो बची है और
बची रहेगी
उसे स्वयम् की रक्षा करके
सामन्जस्य बिठाना आता है।
पर तुम संघर्ष करो
खुद को और अपने अपनों
को बचाने का।
असली संघर्ष
और संघर्ष करना सीखो
प्रकृति से।।
स्वरचित और मौलिक
सर्वाधिकार सुरक्षित
जमीला खातून