बरसात के बाद जब धूप पड़ती है तो अक्सर लोगो के घरों में कैद नए, पुराने सन्दूक भी खुल जाते है. गुनगुनी धूप में पुरानी यादों के कुछ देर आराम करने का बेहद खूबसूरत वक़्त..और इन बन्द संदूको के खुलने से खुल जाती है कुछ पुरानी भूली बिसरी यादों की बन्द तह परत दर परत.. बचपन में वो हमारे फेवरेट सूट जिसे खरीदने के लिए हमने जमीन पर लोट लोट के ज़िद की, शादी की वो चमकीली सी माला, माँ की शादी की चुनर हो या पापा के बचपन की कोई ब्लैक एंड व्हाइट सा फ़ोटो, जिसमे सीलन की वजह से काफी हिस्से गायब हो गए हों.. फिर भी कई खूबसूरत यादे साथ सँजोये रहते है.. दादाजी का वो पुराना सन्दूक खुलना भी हमारे लिए कौतूहल सा होता.. पुराने सन्दूक में बंद कितने साल की कितनी यादें, बन्द परतों में प्रत्यक्ष.. जिसमे वक़्त ठहरा सा लगता है..एक छोटा सा तांबे का कलश सा, याद भी नहीं उसे कहते क्या होंगे.. में बंद पुराने सिक्के जो भले अब उपयोग से बाहर थे, पर किसी खजाने से कम भी नही थे हमारे लिए..तभी तो इतने संजो कर रखा गया था, वैसे दादाजी इसे लक्ष्मी मानते थे, शायद इस वजह से कभी फेंक ना पाए.. बचपन में उसे देखकर तो हमारे चेहरे चमक ही जाते थे..इधर उधर उस कलश को लेकर घूमते हम, खुद को कुबेर से कम नही समझते थे.. अब बचपन क्या जाने पुराने नए सिक्कों में भेद.. दादाजी की तस्वीर जो केवल दादाजी की ना होकर हमे तो पूरे गांव के लोगों की लगती थी.. इतने सारे लोग एक फोटो में..आजकल तो सबको सिंगल फ़ोटो पसन्द है.
एक गांधी टोपी जो पुराने ज़माने में एक अदब, शान का प्रतीक थी.. जिसे हम भी पहनने की कोशिश करते थे, पर दादाजी अक्सर डांट कर कहते कि वो बाबाजी की टोपी है..और हम डर के मारे उसे हाथ भी नहीं लगाते.. पर आश्चर्य होता था सोचकर कि जोगी बाबाजी की टोपी को दादाजी ने क्यों सम्भाल कर रक्खा है.. जोगी नाम से तो पहले ख़ौफ़ कायम था बच्चों में..इस डर से शायद सीधे ये सवाल दादाजी से कभी पूछा ही नहीं.. हां कुछ साल बाद अपने आप पता चल गया वो टोपी दादाजी के पिताजी की थी..उनकी एक याद जो प्रत्यक्ष थी दादाजी के पास..जाने कितने सालों से उसे सम्भालते आये थे और नादान हम जिन्हें उसमें एक मामूली पुरानी टोपी के अलावा कुछ भी ना दिखा..
यादों के पक्ष चल रहे हैं यानी पितृपक्ष..यादें जो खुशी के साथ साथ कभी कभी तकलीफ़ भी देती हैं.. मेरे पास तो उनकी यही यादें हैं..अनगिनत सी..जिन्हें लिखना भी कहां सरल है..बस महसूस किया जा सकता है..हां घर पर उनकी गाँधीटोपी सम्भाल कर रखी है शायद इंतजार में.. किन्हीं नन्हें क़दमों के जो आँगन में घूम घूमकर उनकी इस याद का प्रत्यक्षीकरण कर सके...
कभी नहीं मिटती ये यादें,
और गहरी हो जाती हैं..
साल-दर-साल..