कथा वहीं से आरंभ थी
जहाँ प्यार की बात थी,
कदम कुछ मिसाल थे
राह में आवाज थी।
आज पहाड़ कुछ ऊँचा लगा
न जाने कौन पड़ाव था!
राह कुछ घूमी लगी
न जाने कितनी थकान थी!
पसीना कुछ अधिक था
श्रम का सीमान्त था,
हँसी कुछ गंभीर थी
न जाने कौन राज था!
सोच के दायरे नये थे
प्यार का ये दस्तूर था!
छिपा हुआ कहीं मौन था
उम्र का यही कसूर था।
* महेश रौतेला