यादों के जाम आज,
फिर छलक गए,
लगता हैं, मयखाने में आज उन्होंने,
फिर.....
हाजरी लगाई है.....!
यादों के साये आज,
फिर उभर गए,
लगता हैं आज उन्हें,
फिर,
याद हमारी आई है.....!
छुपा हुआ है आज,
बादल में चाँद,
लगता है आज किसी की,
फिर,
आँखे भर आई है....!
होने लगी बारिश आज,
कुछ इस तरह,
लगता है जैसे आज,
फिर,
तेरी बेवफाई की बातें,
धरती ने अंबर को सुनाई है.....!
तसव्वुर में भी अब,
नाम न लेंगे तेरा,
आज फिर समझ गए,
तू गैर का है,
अब,
तेरी ये प्रीत पराई है....!!!!!
✍✍वर्षा अग्रवाल द्वारा रचित 🙏🙏