सुबह की सुस्ती उड़ा देने वाली चाय,
शाम की खामोश लहरों वाली सड़क,
ऐसी रोज ब रोज जिंदगी भी अब अजीब लगती है !
हर नए दिन में हमें कुछ नया चाहिए,
कुछ अच्छा चाहिए ।
हम क्यों भूल जाते हैं यह,
जो अच्छे की बातें हम करते रहते हैं
थोड़ी सी अच्छाई खुद में क्यों नहीं भर लेते !
वैसे हर रात आधी नींद में उठ जाती हूं,
बीच में सपना जो टूट चुका हो,
उसी को जोड़ने के प्रयास में लगी रहती हूं ।
और साथ ही कल क्या होगा कैसे होगा ?
जैसे हजारों विचार में !
कोशिश करती हूं कि शायद चलो ,
आज कुछ ठीक हो जाए !
लेकिन कभी कबार हालात संभल जाते ,
फिर एक नई मुसीबत मेरी जिंदगी में
दस्तक दे ही चुकी होती है पहले से !
अब इन्हीं उलझनों को सुलझाने की
कोशिशों ने मुझसे जीवन जीने की,
परिभाषा से परे कर दिया है ।
कुछ भी कहो यही तकलीफें मुझे प्रोत्साहित करती है !
अनुभव अति प्रखर शिक्षक साबित हुआ ।
केवल संतुष्टि ही सुख नहीं देती,
बल्कि इच्छाओं का अधूरापन पीड़ित बना देता है
अपूर्णता से आनंद जरूर मिलेगा ।
बस वह खुशी अंतर में खोजने की है जरूरत !
शायद धीरे-धीरे मुझसे ,
आडंबर का धुंधलापन दूर होता नजर आ रहा है ।
फिर सोच रही थी खुद पर तरस क्यों खाना ?!
जब बिना कारण मुस्कुराने पर शिकायत दर्ज नहीं होने वाली !!
Urmi