मैं धरती पर बना रहूँ
तुम आकाश में उड़ा करो,
मैं हवा सा बहा करूँ
तुम वृक्ष सा हिला करो।
मैं फूल में रहा करूँ
तुम सुगन्ध बन फैला करो,
मैं राहगीर बन चला करूँ
तुम राह में मिला करो।
मैं सुबह बन आया करूँ
तुम प्रकाश बन रहा करो,
मैं आग सा जला करूँ
तुम अग्नि- तप्त हुआ करो।
** महेश रौतेला