ए- जिंदगी उसे आफताब कह दूँ या मेहताब,
उस शक़्स में रोशनी की कमी कही नहीं दिख रही।
अरमान कह दूँ या इरफान मेरे जहन के लिए,
नरगिस आंखो से दिल में एक जीने की दिल्लगी ही रही।
हसरत - ए - इश्क़ के लफ्ज़ को जूठ कहूँ या सही,
उसके निकले अल्फ़ाज़ से जो जिंदगी भी सँवरती रही।
करिश्मा उसका कह दूँ, या कुदरत का लिखा कह दूँ,
उसकी सागर जैसी आंखो में खुद गहराई नाप ने चलती रही।
खुदगर्ज का नाम दूँ या मतलबी कह दूँ खुशहाली को,
वो गुमराह हुई फिर भी खुद की तलाश तो जारी रही।
DEAR ZINDAGI 🤗❣️